भारत त्योहारों के साथ-साथ परंपराओं का भी देश है और यही परंपरा आगे बढ़कर प्रथा का भी रूप धारण कर लेती है। जिसमें से कुछ प्रथा अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली होती है, तो कुछ विज्ञान को बढ़ावा देने वाली होती है। इसके साथ-साथ भारत ऋतुओं और मौसमों का भी देश है। अभी हम बात करें तो बसंत ऋतु चल रही है जिसका प्रारंभ फागुन मास माना गया है और चैत्र मास और इन दोनों मास में होने वाली त्यौहार या परंपरा जो क्रमशः है- होली और चैत्र नवरात्रि, फागुन और चैत्र मास। इन सारी चीजों जैसे- ऋतु, मास अर्थात महीना, त्यौहार को आयुर्वेद के नजरिए से देखें तो पुरखों का मौलिक चिकित्सकीय ज्ञान दिखाई देता है। जो परंपराओं से प्रथा के रूप में हमें मिली, और खास बात त्यौहार तो पूरे देश में एक नाम से जाने जाएंगे लेकिन प्रथा हर राज्य और जगह के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं। हम सिर्फ बसंत ऋतु और उसके त्यौहार को आयुर्वेद विज्ञान के नजरिए से देखें तो हमें इस मौसम की दिनचर्या और ऋतुचर्या का वृहद ज्ञान देखने को मिलता है। फाल्गुन मास अर्थात बसंत ऋतु का प्रारंभ आयुर्वेद में बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। इस समय शरीर में सर्दी अर्थात शिशिर ऋतु के दौरान जमा हुआ कफ पिघल कर बढ़ने लगता है जिससे कई रोगों की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए इस ऋतु में होली त्यौहार मनाया जाता है जिसके माध्यम से इस ऋतु की ऋतुचर्या जानी जा सकती है। फाल्गुन में होली त्यौहार जिसमें मुख्यतः हमें बताया जाता था कि पलाश के फूल से ही रंग गुलाल बनाकर होली खेलना है। आयुर्वेद के नजरिए से इन सारी चीजों को देखें तो समझ आता है फाल्गुन में कफ़ पिघलता है तो इसके रोकथाम के लिए गर्म तासीर वाली पलाश फूल का उपयोग करते हैं अगर पलाश फूल की जगह गुलाब फूल का उपयोग करें तो वह कफ को और बढ़ा देगा क्योंकि गुलाब की तासीर ठंडी होती है। पलाश फूल को आयुर्वेद के दोष धातु वीर्य विपाक के अनुसार इस प्रकार समझ सकते हैं- पलाश का रस – कषाय और तिक्त वीर्य- उष्ण त्रिदोष – कफ़ और वात को कम करता है। होली में इसका रंग- त्वचा के लिए औषधि जैसा पलाश फूल में एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल गुण होते हैं। *ठीक ऐसे ही चैत्र नवरात्र का आयुर्वेद विज्ञान के अनुसार महत्व है*चैत्र मास बसंत ऋतु का पूर्ण प्रभाव वाला समय है, इस समय शरीर में कफ दोष पूरी तरह प्रकोप अवस्था में होता है। पाचन शक्ति कमजोर हो सकती है शरीर में आम मतलब टॉक्सिंस बढ़ सकते हैं जिसके कारण आपको एलर्जी, अस्थमा, खांसी, मोटापा यह सब होने लगता है। इन सारी चीजों को दूर करने के लिए *सेतु* के रूप में चैत्र नवरात्र का त्यौहार महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।चैत्र नवरात्र में नव दिन का उपवास बताया गया है, इस उपवास में शाम को स्वल्पाहार बताया गया है। इन सारी बातों को देखें तो यह समझ में आता है कि चैत्र मास में कफ जो है अपने प्रकोप अवस्था के उच्चतम शिखर पर होता है जिसके कारण कफ वाली समस्याएं ज्यादा होती है तो इसको दूर करने और शरीर में वात, पित्त, कफ का संतुलन रखने के लिए यह जो उपवास है वह बहुत ही महत्वपूर्ण है।यह शरीर में बढ़े हुए आम को कम करता है शरीर के वात, पित्त, कफ में संतुलन लाता है, कफ को ज्यादा बढ़ने नहीं देता कम करता है।इस नवरात्र में हम जो खान-पान करते हैं वह हमारे दोषों (वात, पित्त, कफ़ )को संतुलित रखता है। यह एक ऋतुचर्या और दिनचर्या का मुख्य संकेतक त्यौहार है। जो हमारे पूर्वजों द्वारा हमें एक ज्ञान के रूप में दिया है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, जो प्रथा के रूप में रूपांतरित हो चुकी है, और हर पीढ़ी उसका निर्वहन बड़े ही श्रद्धा से करती आ रही है। इन दोनों फाल्गुन और चैत्र मास के त्यौहारों को आयुर्वेद के नजरिए से देखें तो यह समझ में आता है कि फाल्गुन के शुरुआत में कफ प्रकोप अवस्था में होता है लेकिन चैत्र मास तक यह प्रकोप अवस्था की उच्चतम शिखर में होता है। तो इन दोनों को ध्यान में रखते हुए हमारे पूर्वजों द्वारा एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह त्यौहार मनाया गया, जिससे आपके शरीर में वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहे। इसलिए कफ को दूर करने के लिए त्यौहार के माध्यम से हमें संदेश दिया गया गर्म ताशीर वाली पलाश फूल का जिससे हम ऋतु के अनुसार समझ सके कि हमारे शरीर में जो परिवर्तन हो रहा है, कफ बढ़ रहा है उसको गर्म ताशीर से ठीक करना है। ठीक ऐसे ही चैत्र नवरात्र में जब कफ बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो उसको संतुलित करने के लिए और शरीर में बनने वाले आम को दूर करने के लिए उपवास का निर्देश एक धार्मिक मान्यता के अनुसार दिया गया। अगर आप इन त्योहारों के पद्धति और खान-पान को अच्छे से समझे तो आपको आयुर्वेद के ऋतुचर्या और दिनचर्या का पूर्णता तालमेल दिखाई देता है। फाल्गुन के त्यौहार होली का खानपान और चैत्र नवरात्र का खानपान देख कर आप उस समय (महीने ) क्या भोजन करना है और क्या नहीं ये समझ सकते हैं। आप त्योहारों की पूजा पद्धति से भी समझ सकते हैं कि प्रकृति पूजा ही सर्वोपरि है, जिसके माध्यम से हमें ये जानकारी हमारे पूर्वज दिए की आप चैत्र नवरात्र में जंवारा बोएं(जंवारा गेहूँ का बोया जाता है माता आराधना में ) ये एक तरह का संकेत है कि आप इस मौसम में गेहूँ खा सकते हैं यह आपके पाचन के लिए फायदेमंद है, इसी तरह से ऐसे ही अनेकों छोटे छोटे प्रथाओं से इन त्योहारों के माध्यम से अपने खान-पान को समझ सकते हैं और अपने शरीर को रोगों से बचा सकते हैं।तो जब भी आपको उस महीने और मौसम का खानपान जानना हो अपने त्योहारों को ज़रूर देखें, ये त्यौहार ही आपकी रोगों से रक्षा करेगा और एक डाइटीशियन के रूप में आपको बरसात, ठंड, गर्मी के अनुसार खानपान सीखा जायेगा, जो सैकड़ों सालों से प्रमाणित है और आज भी सर्वमान्य साबित हो रहा है।यह त्यौहार आपको जीवन जीने की, कला सीखाता है यही आयुर्वेद का सार है।
लेखक पेशे से आयुर्वेदिक चिकित्सक है, रायपुर में निवासरत है – डॉ गुलशन कुमार सिन्हा