नई दिल्ली। बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था Butterflies से जुड़े एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में सामने आया है कि दुनिया भर में हर 6 में से 1 लड़का यौन शोषण का शिकार होता है। इसके बावजूद यह मुद्दा समाज में अक्सर अनदेखा और अनसुना रह जाता है, क्योंकि अधिकांश मामले रिपोर्ट ही नहीं होते।
अध्ययन में भारत समेत चार एशियाई देशों को शामिल किया गया, जिसमें यह पाया गया कि आम धारणा यह है कि यौन हिंसा केवल लड़कियों के साथ होती है। इसी सोच के कारण लड़कों के साथ होने वाले शोषण को या तो नजरअंदाज कर दिया जाता है या उसे असामान्य मानकर दबा दिया जाता है। मर्दानगी से जुड़ी पारंपरिक सोच—जैसे मजबूत और साहसी दिखना—लड़कों को अपनी पीड़ा छिपाने पर मजबूर करती है।
भारत में भी स्थिति चिंताजनक है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 2007 में किए गए अध्ययन में पाया गया था कि 53.22 प्रतिशत बच्चों ने किसी न किसी रूप में यौन शोषण का सामना किया, जिसमें लड़कों की हिस्सेदारी भी लगभग बराबर रही। इसके बाद बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए POCSO Act 2012 लागू किया गया, जो लड़कों और लड़कियों दोनों के लिए समान रूप से प्रभावी है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि लड़कों के साथ शोषण होने पर उन्हें अक्सर कमजोर समझा जाता है, जिसके कारण वे शर्म और डर के चलते अपनी बात सामने नहीं रख पाते। सामाजिक दबाव, आधिकारिक आंकड़ों पर अविश्वास और जागरूकता की कमी के कारण इस तरह के मामलों की रिपोर्टिंग बहुत कम होती है, जिससे पीड़ितों का मानसिक आघात और बढ़ जाता है।
“ब्रेकिंग द साइलेंस” अध्ययन में सामने आया कि अधिकांश मामलों में आरोपी कोई परिचित व्यक्ति ही होता है, जैसे रिश्तेदार, पड़ोसी या परिवार के जानकार। यह भी पाया गया कि शोषण केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि महिलाएं और बड़े साथी भी कर सकते हैं, जो अलग-अलग तरीकों से बच्चों को अपने जाल में फंसाते हैं।
इस गंभीर मुद्दे पर जागरूकता बढ़ाने के लिए Blue Umbrella Day मनाया जा रहा है, जो Family For Every Child के वैश्विक अभियान का हिस्सा है। इस पहल का उद्देश्य समाज को यह समझाना है कि यौन हिंसा के शिकार लड़के और लड़कियां दोनों होते हैं और दोनों को समान सुरक्षा और देखभाल की आवश्यकता है।
संस्था की निदेशक Rita Panicker ने कहा कि अब समय आ गया है कि इस मुद्दे पर बनी चुप्पी को तोड़ा जाए और बच्चों की सुरक्षा को लेकर समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जाए।
यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि परिवार, स्कूल और समाज को मिलकर ऐसा सुरक्षित वातावरण बनाना होगा, जहां बच्चे बिना डर अपनी बात रख सकें और उन्हें समय पर उचित सहायता मिल सके।