2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा कारोबारी भुगतान पर 0.4% MDR लागू करने की तैयारी, कैट ने शुल्क-मुक्त सीमा बढ़ाने की मांग की
नई दिल्ली। यूपीआई के जरिए 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा कारोबारी भुगतान पर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस व्यवस्था के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए शुल्क लागू करने के कानूनी आधार और इसके संभावित प्रभावों पर सवाल उठाए गए हैं। मामले में अभी सुनवाई की तारीख तय नहीं हुई है।
अधिवक्ता अंजन दत्ता की ओर से दायर याचिका में केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और संबंधित यूपीआई समिति को पक्षकार बनाया गया है। याचिका में 14 सितंबर की अधिसूचना और 15 सितंबर को घोषित MDR फ्रेमवर्क को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने इसके क्रियान्वयन पर रोक लगाने और व्यवस्था को रद्द करने की मांग की है। <Cite refs={[“turn0search1″,”turn0search3”]}/>
15 अक्टूबर से लागू होना है नया शुल्क ढांचा
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 2,000 रुपये से अधिक के सामान्य पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लगाया जाएगा। 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये निर्धारित की गई है।
हालांकि, यह शुल्क सभी यूपीआई भुगतानों पर लागू नहीं होगा। पर्सन-टू-पर्सन (P2P) लेनदेन पहले की तरह शुल्क-मुक्त रहेंगे। छोटे व्यापारियों और कुछ आवश्यक सेवाओं के लिए भी अलग प्रावधान किए गए हैं। <Cite refs={[“turn0news18″,”turn0news19″,”turn0news20”]}/>
कैट ने वित्त मंत्री को लिखा पत्र
देश के प्रमुख व्यापारी संगठन कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने केंद्रीय वित्त मंत्री को पत्र लिखकर प्रस्तावित MDR पर पुनर्विचार की मांग की है। संगठन का कहना है कि कपड़ा, किराना, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य खुदरा कारोबार में मुनाफे का मार्जिन कई बार काफी कम रहता है।
कैट के मुताबिक, जिन व्यापारियों का शुद्ध लाभ मार्जिन 0.5 से 1 प्रतिशत के आसपास है, उनके लिए 0.4 प्रतिशत शुल्क आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है। संगठन ने शुल्क-मुक्त लेनदेन की सीमा को बढ़ाकर 10,000 रुपये या 25,000 रुपये करने का सुझाव दिया है।
व्यापारियों ने नकद और चेक से भुगतान की बात कही
दिल्ली के कुछ व्यापारी संगठनों ने MDR के विरोध में कहा है कि यदि शुल्क वापस नहीं लिया गया तो वे बड़े भुगतानों के लिए नकद या चेक जैसे पारंपरिक माध्यमों को प्राथमिकता देने पर विचार कर सकते हैं। व्यापारियों का तर्क है कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के बाद उस पर अतिरिक्त लागत लगाना छोटे और मध्यम कारोबारियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
सरकार का स्पष्टीकरण: ग्राहकों से सीधे शुल्क नहीं लिया जाएगा
सरकार ने स्पष्ट किया है कि MDR व्यापारियों से संबंधित शुल्क है और इसे सीधे ग्राहकों पर डालने की अनुमति नहीं होगी। सरकार के अनुसार, 2,000 रुपये तक के निर्धारित मर्चेंट यूपीआई भुगतान शुल्क-मुक्त रहेंगे, जबकि व्यक्तिगत यूपीआई ट्रांसफर पर कोई MDR नहीं लगेगा।
कुछ क्षेत्रों, जैसे रेलवे, ईंधन, बीमा, टेलीकॉम और कृषि इनपुट से जुड़े भुगतानों के लिए अलग फ्लैट शुल्क का प्रावधान किया गया है। इन श्रेणियों में 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर 5 रुपये का शुल्क प्रस्तावित है। <Cite refs={[“turn0news14″,”turn0news19″,”turn0news21”]}/>
सरकार ने विदेशी दबाव के आरोपों को खारिज किया
यूपीआई शुल्क को लेकर उठे राजनीतिक विवाद के बीच वित्त मंत्रालय ने उन आरोपों को खारिज किया है, जिनमें फैसले को विदेशी दबाव से जोड़कर देखा जा रहा था। मंत्रालय का कहना है कि भारत के यूपीआई से जुड़े नीतिगत निर्णय स्वतंत्र रूप से लिए जाते हैं।
सरकार ने इस व्यवस्था का उद्देश्य डिजिटल भुगतान के बुनियादी ढांचे, साइबर सुरक्षा और संचालन को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखना बताया है। दूसरी ओर, व्यापारी संगठन शुल्क के कारण कारोबार की लागत बढ़ने की आशंका जता रहे हैं।
MDR पर GST का भी मुद्दा
वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, MDR को भुगतान निपटान सेवा के रूप में माना जाता है, इसलिए इस पर 18 प्रतिशत GST का प्रश्न भी उठता है। GST-पंजीकृत व्यापारी लागू नियमों के तहत इस राशि का इनपुट टैक्स क्रेडिट लेने का दावा कर सकते हैं। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव व्यापारी की कर स्थिति और संबंधित नियमों पर निर्भर करेगा।
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और केंद्र सरकार की प्रस्तावित व्यवस्था पर आगे होने वाली कानूनी एवं नीतिगत कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।