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Saturday, October 10, 2026
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लैलूंगा के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में ‘सुशासन’ के दावों की खुली पोल! बेटियों की छत बचाने पालकों से जुटाए ₹500, मिलकर कर रहे श्रमदान ये कैसा सुशासन?

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रायगढ़/लैलूंगा। छत्तीसगढ़ में सुशासन और बेहतर शिक्षा व्यवस्था के दावों के बीच रायगढ़ जिले के लैलूंगा विकासखंड से सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बदहाल तस्वीर सामने आई है। झगरपुर स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय की जर्जर इमारत छात्राओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। हालात ऐसे हैं कि विद्यालय भवन की मरम्मत के लिए विद्यालय प्रबंधन समिति द्वारा पालकों से 500-500 रुपये जमा कराने की सूचना सामने आई है। इसके साथ ही पालकों से दो दिन श्रमदान करने की अपील भी की गई है।

जानकारी के अनुसार, विद्यालय में अगस्त महीने में मेगा बैठक आयोजित की गई थी। बैठक के बाद अभिभावकों के व्हाट्सएप ग्रुप में एक सूचना साझा की गई। इसमें विद्यालय भवन को अत्यधिक जर्जर बताते हुए उसकी मरम्मत के लिए प्रत्येक पालक से 500 रुपये नकद जमा करने को कहा गया। सूचना में राशि जमा करने के लिए रविवार 30 अगस्त की शाम 4 बजे तक की समय-सीमा भी निर्धारित की गई थी।

जर्जर भवन, छात्राओं की सुरक्षा पर सवाल

कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय में दूर-दराज के इलाकों से आने वाली छात्राएं रहकर पढ़ाई करती हैं। ऐसे में भवन की स्थिति सीधे तौर पर छात्राओं की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। विद्यालय भवन के रखरखाव और आवश्यक मरम्मत की जिम्मेदारी सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत आती है, लेकिन झगरपुर में सामने आए मामले ने इस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पालकों के सामने एक ओर अपनी बेटियों की सुरक्षा का सवाल है, तो दूसरी ओर सीमित आर्थिक संसाधनों के बीच 500 रुपये जमा करने की जिम्मेदारी भी आ गई है। ग्रामीण और मजदूर परिवारों के लिए यह राशि भले छोटी दिखाई दे, लेकिन रोजमर्रा की जरूरतों के बीच इसे जुटाना उनके लिए आसान नहीं है।

मरम्मत के लिए श्रमदान का भी फरमान

मामला सिर्फ 500 रुपये जमा कराने तक सीमित नहीं है। सामने आई सूचना में पालकों से विद्यालय में दो दिन श्रमदान करने की बात भी कही गई है। यानी जिस भवन की मरम्मत और रखरखाव सरकारी व्यवस्था के तहत होना चाहिए, उसके लिए पालकों से आर्थिक सहयोग के साथ श्रमदान भी लिया जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और सरकारी आवासीय विद्यालयों के रखरखाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सरकारी इंजीनियरों की जगह जनप्रतिनिधि उठा रहे सामान

मामले की जमीनी तस्वीर भी कई सवाल खड़े करती है। सामने आए वीडियो में स्थानीय जनप्रतिनिधि और बीडीसी प्रतिनिधि भारी लोहे के फ्रेम और अन्य सामान कंधे पर उठाते हुए नजर आ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि विद्यालय भवन की मरम्मत के लिए जहां संबंधित विभाग के जिम्मेदार अधिकारी, इंजीनियर और निर्माण एजेंसी सक्रिय नजर आनी चाहिए थी, वहां स्थानीय जनप्रतिनिधियों को ही निर्माण कार्य में हाथ बंटाना क्यों पड़ रहा है।

सामाजिक कार्यकर्ता ने सरकार पर साधा निशाना

इस मामले को सामाजिक कार्यकर्ता रवि भगत ने वीडियो के जरिए सार्वजनिक किया है। उन्होंने सरकार की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि बालिकाओं के आवासीय विद्यालय की मरम्मत के लिए बजट उपलब्ध नहीं है तो पूरे लैलूंगा क्षेत्र की जनता से 500-500 रुपये चंदा मांग लिया जाए, ताकि कम से कम बच्चियों के सिर की छत सुरक्षित रह सके।

रवि भगत के इस बयान के बाद अब यह मामला चर्चा में आ गया है। खासकर इसलिए क्योंकि राज्य सरकार लगातार सुशासन, शिक्षा और जनजातीय क्षेत्रों के विकास को अपनी प्राथमिकताओं में गिनाती रही है।

सुशासन के दावों के बीच जमीनी हकीकत पर सवाल

छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से शिक्षा और आदिवासी क्षेत्रों के विकास को लेकर लगातार योजनाएं और घोषणाएं की जाती रही हैं। ऐसे में एक सरकारी बालिका आवासीय विद्यालय में भवन की मरम्मत के लिए पालकों से राशि जमा कराने और श्रमदान लेने की स्थिति सामने आना सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर को उजागर करता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि सरकारी विद्यालय की छत जर्जर है तो उसकी मरम्मत के लिए सरकारी बजट और विभागीय व्यवस्था का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया? छात्राओं की सुरक्षा से जुड़े इस महत्वपूर्ण कार्य का भार गरीब पालकों पर क्यों आया?

अब पूरे मामले में शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन की प्रतिक्रिया का इंतजार है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन विद्यालय भवन की वास्तविक स्थिति की जांच कराकर छात्राओं की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाता है और मरम्मत के लिए पालकों से राशि तथा श्रमदान लेने की व्यवस्था पर क्या निर्णय लिया जाता है।

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