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Tuesday, September 1, 2026
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कमरछठ सिर्फ संतान की दीर्घायु का व्रत नहीं, महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी प्राचीन परंपरा भी! जानिए महुआ, छह भाजियों और ‘कांसी’ बांधने का वैज्ञानिक महत्व

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कमरछठ सिर्फ संतान की दीर्घायु का व्रत नहीं, महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी प्राचीन परंपरा भी! जानिए महुआ, छह भाजियों और ‘कांसी’ बांधने का वैज्ञानिक महत्व

रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराओं में कमरछठ व्रत का विशेष महत्व है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी को महिलाएं अपनी संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना के लिए यह व्रत रखती हैं। नवविवाहित महिलाएं संतान प्राप्ति की कामना से भी यह व्रत करती हैं। इस दौरान निर्जला उपवास, महुआ से जुड़ी परंपराएं, कांसी घास बांधना और छह प्रकार की भाजियों का सेवन इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं।

आयुर्वेद चिकित्सक एवं जानकार डॉ. गुलशन कुमार सिन्हा के अनुसार, कमरछठ की परंपरा को केवल धार्मिक आस्था के रूप में देखने के बजाय इसके पीछे छिपे स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं को भी समझने की जरूरत है। उनका मानना है कि इस व्रत की कई परंपराओं में प्राकृतिक संसाधनों और महिला स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण तत्व दिखाई देते हैं।

महुआ का कमरछठ में विशेष महत्व

कमरछठ के दिन महुआ की लकड़ी से दातुन करने, महुआ की खरी से स्नान करने, महुआ के पत्ते की पतरी और लकड़ी के चम्मच का उपयोग करने तथा महुआ के तेल का इस्तेमाल करने की परंपरा है।

डॉ. सिन्हा बताते हैं कि आयुर्वेद में महुआ को मधुक, गुड़पुष्प और माधव कहा गया है। इसका वानस्पतिक नाम Madhuca indica बताया जाता है। आयुर्वेद में इसे मधुर-कषाय रस, गुरु-स्निग्ध गुण और शीत वीर्य वाला माना गया है। परंपरागत रूप से महुआ का उपयोग विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में किया जाता रहा है।

कांसी बांधने की परंपरा और एक्यूप्रेशर से जोड़ा गया महत्व

कमरछठ के दौरान कांसी या कुश जैसी घास को अंगूठे और अनामिका के बीच पकड़कर एक ही बार में गांठ बांधने की परंपरा है।

डॉ. सिन्हा के अनुसार, हठयोग परंपरा (महर्षि घेरंड रचित)में अंगूठे और अनामिका को मिलाने से बनने वाली मुद्रा को पृथ्वी मुद्रा कहा जाता है। उनका कहना है कि इस स्थिति में हथेली और अंगुलियों के कुछ दबाव बिंदु(एक्यूप्रेशर point )सक्रिय हो सकते हैं।

उन्होंने इसे पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland) और उससे संबंधित हार्मोनल गतिविधियों से जोड़ते हुए बताया कि पीयूष ग्रंथि से GH, TSH, ACTH, FSH, LH और Prolactin जैसे हार्मोन के स्राव का नियंत्रण होता है। इनमें कुछ हार्मोन शरीर की वृद्धि, थायराइड, अधिवृक्क ग्रंथि और प्रजनन संबंधी प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हालांकि, इन एक्यूप्रेशर दावों को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के प्रमाणित उपचार के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। कमरछठ की इन परंपराओं के स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों पर वैज्ञानिक शोध की आवश्यकता है।

छह भाजियों का भी है खास महत्व

कमरछठ व्रत के बाद पसहर चावल, छह प्रकार की भाजी और भैंस के दूध-दही का सेवन करने की परंपरा है। इन छह भाजियों में शामिल हैं—

  1. कद्दू भाजी
  2. जरी भाजी
  3. अमारी (खट्टी) भाजी
  4. चेंच भाजी
  5. मुनगा भाजी
  6. कांदा भाजी

इनमें अलग-अलग पोषक तत्व पाए जाते हैं। अमारी जैसी खट्टी भाजी पाचन में सहायक मानी जाती है, जबकि मुनगा और अन्य हरी भाजियां भी पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। चेंच भाजी में प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट पाए जाने की बात भी बताई गई है।

सगरी और पौधों की परंपरा

कमरछठ के दौरान गांव में सगरी यानी छोटा कुंड खोदकर उसके आसपास पौधे और घास लगाने की भी परंपरा है। इसमें कांसी, अपामार्ग (चिरचिटा), बेर, आम और चिरैया जैसे पौधों को स्थान दिया जाता है।

यह परंपरा ग्रामीण जीवन, कृषि और प्रकृति से कमरछठ के गहरे संबंध को भी दर्शाती है।

क्या कमरछठ को ‘प्राचीन महिला स्वास्थ्य मिशन’ कहा जा सकता है?

डॉ. गुलशन कुमार सिन्हा के अनुसार, कमरछठ की परंपराओं में महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े कई पहलुओं को देखा जा सकता है। उनका मानना है कि पुराने समय में स्वास्थ्य संबंधी व्यवहारों को धार्मिक आस्था और परंपरा से जोड़कर समाज में लंबे समय तक बनाए रखने की कोशिश की जाती थी।

उनके अनुसार, महुआ का उपयोग, विभिन्न प्रकार की हरी भाजियां, दूध-दही और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी परंपराएं इस बात की ओर संकेत करती हैं कि कमरछठ में पोषण, प्रकृति और महिला स्वास्थ्य के कई पहलू मौजूद हैं।

हालांकि, कमरछठ की सभी स्वास्थ्य संबंधी व्याख्याओं को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित मानने से पहले आधुनिक चिकित्सा और पोषण विज्ञान के आधार पर शोध जरूरी है।

सिर्फ व्रत नहीं, छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपरा

कमरछठ छत्तीसगढ़ की उन लोकपरंपराओं में शामिल है, जिनमें धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति, कृषि, स्थानीय खाद्य पदार्थ और पारंपरिक जीवनशैली भी जुड़ी हुई है। यही वजह है कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं इस परंपरा को पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाती हैं।

कमरछठ की परंपरा हमें यह भी बताती है कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति में प्रकृति और स्वास्थ्य का रिश्ता कितना पुराना और गहरा रहा है।

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